ॐ ब्रह्म क्या है? जानिए इसका आध्यात्मिक अर्थ और रहस्य
प्रभु प्रेमियों ! परमात्मा की मौज से जो सबसे पहले ओम् शब्द उत्पन्न हुआ है और उन ओम् शब्द के सहित सृष्टि के कण- कण में भी परमात्मा-अंश व्यापक है; क्योंकि परमात्मा सर्वव्यापक है और सर्वव्यापकता से भी पड़े कितना है, उसका कोई नापतोल या संख्या नहीं है। इसलिए उसे अनंत कहते हैं। जो अंश परमात्मा का ओम् में व्यापक है, उसे ही ॐ ब्रह्म कहा गया है।
शब्दकोश में 'ॐ ब्रह्म' के पहले वाले ॐ शब्द के बारे में जानने के लिए 👉 यहां दबाए
प्रभु प्रेमियों ! परमात्मा की मौज से जो सबसे पहले ओम् शब्द उत्पन्न हुआ है और उन ओम् शब्द के सहित सृष्टि के कण- कण में भी परमात्मा-अंश व्यापक है; क्योंकि परमात्मा सर्वव्यापक है और सर्वव्यापकता से भी पड़े कितना है, उसका कोई नापतोल या संख्या नहीं है। इसलिए उसे अनंत कहते हैं। जो अंश परमात्मा का ओम् में व्यापक है, उसे ही ॐ ब्रह्म कहा गया है।
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MMS_अ ॐ ब्रह्म ( सं ० पुं ० ) ओंकार - शब्दब्रह्म , ध्वन्यात्मक ओंकार जो ब्रह्म का ही एक रूप है , ध्वन्यात्मक ओंकार में व्याप्त परमात्मा का अंश ।
ॐ ब्रह्म ( सं ० पुं ० ) ओंकार - शब्दब्रह्म , ध्वन्यात्मक ओंकार जो ब्रह्म का ही एक रूप है , ध्वन्यात्मक ओंकार में व्याप्त परमात्मा का अंश ।
'मोक्ष दर्शन' पुस्तक में 'ॐ ब्रह्म' का वर्णन
ॐ ब्रह्म की उत्पत्ति और अर्थ
अध्यात्म की गहराइयों में 'ॐ' (ओम्) केवल एक शब्द नहीं, बल्कि सृष्टि की आदि ध्वनि है। सन्तमत के महान योगियों और महर्षि मेँहीँ परमहंस जी के विचारों के अनुसार, 'ॐ ब्रह्म' उस परमतत्व का वह अंश है जो इस ध्वन्यात्मक शब्द में समाया हुआ है।
अध्यात्म की गहराइयों में 'ॐ' (ओम्) केवल एक शब्द नहीं, बल्कि सृष्टि की आदि ध्वनि है। सन्तमत के महान योगियों और महर्षि मेँहीँ परमहंस जी के विचारों के अनुसार, 'ॐ ब्रह्म' उस परमतत्व का वह अंश है जो इस ध्वन्यात्मक शब्द में समाया हुआ है।
शब्द ब्रह्म और परमात्मा का विस्तार
परमात्मा अनंत है। उसकी व्यापकता का कोई नाप-तोल या सीमा नहीं है।
- शब्द ब्रह्म: यह ओंकार का वह रूप है जो ध्वन्यात्मक है और जिसे ब्रह्मांड की पहली हलचल माना जाता है।
- अनंत परमात्मा: जो सर्वव्यापकता से भी परे है, वह अनंत है।
परमात्मा अनंत है। उसकी व्यापकता का कोई नाप-तोल या सीमा नहीं है।
- शब्द ब्रह्म: यह ओंकार का वह रूप है जो ध्वन्यात्मक है और जिसे ब्रह्मांड की पहली हलचल माना जाता है।
- अनंत परमात्मा: जो सर्वव्यापकता से भी परे है, वह अनंत है।
'मोक्ष दर्शन' के अनुसार ॐ ब्रह्म की व्याख्या
महर्षि मेँहीँ परमहंस जी द्वारा रचित पुस्तक 'मोक्ष दर्शन' के पैराग्राफ 15 में इसकी सटीक व्याख्या मिलती है। उन्होंने समझाया है कि:
"परम प्रभु सर्वेश्वर अंशी हैं और ब्रह्म (सच्चिदानन्द ब्रह्म, ॐ ब्रह्म, पूर्ण ब्रह्म), ईश्वर तथा जीव उनके अटूट अंश हैं।"
इसे एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है: जैसे महदाकाश (विशाल आकाश) के भीतर ही मठाकाश (मठ के अंदर का आकाश), घटाकाश (घड़े के अंदर का आकाश) और पटाकाश (वस्त्र के अंदर का आकाश) समाहित हैं, वैसे ही उस परम सत्ता के भीतर ही ये सभी रूप विद्यमान हैं।
महर्षि मेँहीँ परमहंस जी द्वारा रचित पुस्तक 'मोक्ष दर्शन' के पैराग्राफ 15 में इसकी सटीक व्याख्या मिलती है। उन्होंने समझाया है कि:
"परम प्रभु सर्वेश्वर अंशी हैं और ब्रह्म (सच्चिदानन्द ब्रह्म, ॐ ब्रह्म, पूर्ण ब्रह्म), ईश्वर तथा जीव उनके अटूट अंश हैं।"
इसे एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है: जैसे महदाकाश (विशाल आकाश) के भीतर ही मठाकाश (मठ के अंदर का आकाश), घटाकाश (घड़े के अंदर का आकाश) और पटाकाश (वस्त्र के अंदर का आकाश) समाहित हैं, वैसे ही उस परम सत्ता के भीतर ही ये सभी रूप विद्यमान हैं।
निष्कर्ष और निवेदन
प्रभु प्रेमियों ! 'ॐ ब्रह्म' उस निराकार और सर्वव्यापक परमात्मा का वह स्वरूप है, जो सृष्टि की आदि ध्वनि 'ओम्' के माध्यम से अभिव्यक्त होता है। यह जीव और ब्रह्म के अटूट संबंध का प्रतीक है। अधिक विस्तार से जानना चाहते हैं, तो हमारे अन्य लेख भी अवश्य पढ़ें। हमारे व्हाट्सएप चैनल को सब्सक्राइब कर ले, वहाँ पर हर अपडेट आपको मिलता रहेगा। जिसमें सत्संग ध्यान का न्यूज़ और सत्संग ध्यान से संबंधित हर तरह का जो भी अपडेट है। तुरंत शेयर किया जाता है। व्हाट्सएप चैनल को सब्सक्राइब करने के लिए 👉 यहाँ दवाएँ ।
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Reviewed by सत्संग ध्यान
on
मई 07, 2025
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